Thursday, August 20, 2026
HomeAyodhya/Ambedkar Nagarअयोध्याशक की बीमारी गंभीर होने पर बन सकती है अपराध की वजह

शक की बीमारी गंभीर होने पर बन सकती है अपराध की वजह


अयोध्या । राजधानी में हुई डबल मर्डर और सुसाइड की घटना ने मानसिक स्वास्थ्य को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अत्यधिक शक और उससे जुड़ी मानसिक बीमारी कई बार व्यक्ति को गंभीर अपराध की ओर भी ले जा सकती है। ऐसे मामलों में समय पर पहचान और इलाज बेहद जरूरी है।

जिला चिकित्सालय के मनोपरामर्शदाता डा. आलोक मनदर्शन के अनुसार लगातार शक की प्रवृत्ति मानसिक बीमारी का रूप ले सकती है। इसके हल्के और मध्यम रूप को पैरानॉयड पर्सनैलिटी डिसऑर्डर (पीपीडी) तथा गंभीर स्थिति को पैरानॉयड सिजोफ्रेनिया कहा जाता है। ऐसे मरीजों में अक्सर 20 से 45 वर्ष की उम्र के लोग देखे जाते हैं।


दिमाग को कोई नियंत्रित कर रहा है, ऐसा हो सकता है भ्रम


ऐसे मरीज को लग सकता है कि कोई उसके दिमाग को पढ़ रहा है, उसे नियंत्रित कर रहा है या उसके दिमाग में तरंगें भेज रहा है। कई बार उसे लगता है कि सहकर्मी या दूसरे लोग उसके खिलाफ षड्यंत्र कर रहे हैं, उसे जहर दिया जा सकता है या उस पर हमला होने वाला है।

कुछ मामलों में मरीज को अपने जीवनसाथी या प्रेमी-प्रेमिका की बेवफाई का अत्यधिक शक होने लगता है। स्थिति गंभीर होने पर यह शक आत्महत्या या दूसरे व्यक्ति पर हमला करने जैसी घटनाओं का कारण भी बन सकता है। मरीज को ऐसी आवाजें, दृश्य, गंध, स्वाद या स्पर्श महसूस हो सकते हैं, जिनका वास्तविकता से कोई संबंध नहीं होता।


इलाज में परिवार की भूमिका अहम


डा. आलोक मनदर्शन ने बताया कि ऐसे मरीजों के इलाज में परिवार की जागरूकता सबसे महत्वपूर्ण है। अक्सर मरीज खुद को बीमार नहीं मानता और डॉक्टर या दवा पर भी शक करने लगता है। उसे यह तक लग सकता है कि परिवार के लोग इलाज के नाम पर उसके खिलाफ साजिश कर रहे हैं।

ऐसी स्थिति में परिजनों का गुस्सा या मरीज के साथ कठोर व्यवहार समस्या को और बढ़ा सकता है। अंधविश्वास के कारण इलाज में देरी भी नुकसानदायक हो सकती है। परिवार को धैर्य और संवेदनशीलता के साथ मरीज को उपचार के लिए तैयार करना चाहिए।

उन्होंने बताया कि चिकित्सकीय निगरानी में दवाओं के साथ मनोचिकित्सा और व्यवहार संबंधी उपचार से मरीज की स्थिति में सुधार लाया जा सकता है। समय पर इलाज मिलने से मरीज में बीमारी को समझने की क्षमता विकसित होती है और उसका पुनर्वास भी संभव है।

डा. आलोक मनदर्शन के अनुसार, “शक ऐसा मर्ज है जिसका इलाज हकीम लुकमान के पास भले नहीं था, लेकिन आधुनिक मनोचिकित्सा में इसका प्रभावी उपचार संभव है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

RELATED ARTICLES

Most Popular

Recent Comments