◆ अयोध्या की पौराणिक नदी को नया जीवन देने की दिशा में हो रहा कार्य, 25 किमी क्षेत्र को पुनर्जीवित करने का लक्ष्य
अयोध्या। पौराणिक नदी तिलोदकी गंगा के पुनरुद्धार का कार्य तेज़ी से चल रहा है। सोहावल, मसौधा, पूराबाजार और नगर निगम क्षेत्र से होकर बहने वाली इस नदी का ऐतिहासिक, धार्मिक और पर्यावरणीय महत्व रहा है। वर्षों से उपेक्षित रही यह नदी अब फिर से अपने प्रवाह की ओर लौट रही है।
मान्यता है कि यह नदी ऋषि रमणक की तपोभूमि से निकलती है, जिसका उद्गम स्थल पंडितपुर गांव के पास स्थित है। यह नदी पहले पांच से अधिक ग्राम पंचायतों को सिंचाई जल देती थी और भाद्रपद अमावस्या के अवसर पर घाटों पर पारंपरिक कुशोदपाटिनी मेला लगता था। लेकिन नदी के लुप्त हो जाने से यह परंपरा भी धीरे-धीरे समाप्त हो गई थी।
मनरेगा योजना के तहत हो रहा कार्य
जिला प्रशासन द्वारा नदी के पुनर्जीवन की योजना मनरेगा और राज्य वित्त के सहयोग से चलाई जा रही है। अब तक 25 किमी में से 11 किमी क्षेत्र को सीमांकित कर कार्य पूर्ण किया जा चुका है। इस प्रक्रिया में 43,703 मानव दिवसों का सृजन हुआ है और 3,100 परिवारों को अस्थायी रोजगार मिला है।
धार्मिक आयोजनों के पुनः शुरू होने की संभावना
पुनरुद्धार के साथ ही तिलोदकी घाटों पर धार्मिक आयोजन फिर से शुरू होने की उम्मीद जताई जा रही है। पंडितपुर और यज्ञवेदी घाट पर अमावस्या स्नान और दान की परंपरा पहले से चली आ रही है, जो नदी के सूख जाने से बाधित हो गई थी।
वैदिक वनों की स्थापना
परियोजना के एक अन्य हिस्से में नदी किनारे वैदिक वनों की स्थापना की जा रही है। इसके अंतर्गत 58 ग्राम पंचायतों में करीब 5 लाख पौधों का रोपण प्रस्तावित है। इन वनों को वशिष्ठ, अगस्त्य, वाल्मीकि, अत्रि, श्रृंगी, गार्गी, मैत्रेयी जैसी ऋषि-ऋषिकाओं के नाम पर नामित किया गया है। लगाए जाने वाले पौधों में शीशम, अर्जुन, नीम, पीपल, बरगद, हरसिंगार जैसी देशी प्रजातियाँ शामिल हैं।
जलस्तर में सुधार व पर्यावरणीय संतुलन की उम्मीद
पुनरुद्धार कार्य पूरा होने के बाद भूजल स्तर में वृद्धि, सिंचाई सुविधा में सुधार और जलभराव की समस्या से राहत मिलने की संभावना जताई जा रही है। साथ ही, पौधरोपण और वनों के निर्माण से पर्यावरण संरक्षण को भी बल मिलेगा। अब तक 35,000 मानव दिवसों के सृजन के साथ 2,000 परिवारों को इससे रोजगार मिल चुका है।