जन्माष्टमी पर मनोस्वास्थ्य को लेकर डॉ. आलोक मनदर्शन ने गीता की शिक्षाओं का बताया महत्व
अयोध्या। आधुनिक जीवन की भागदौड़ और तनाव के बीच मन में पैदा होने वाली निराशा, भय, क्रोध, मोह और चिंता जैसी स्थितियों से निपटने में श्रीमद्भगवद्गीता की शिक्षाएं आज भी उपयोगी हो सकती हैं। जिला चिकित्सालय के मनो परामर्शदाता डॉ. आलोक मनदर्शन ने जन्माष्टमी के अवसर पर मनोस्वास्थ्य के संदर्भ में गीता के संदेशों की उपयोगिता पर प्रकाश डाला।
उन्होंने बताया कि आधुनिक मनोचिकित्सा की प्रमुख विधि कॉग्निटिव बिहेवियरल थैरेपी (सीबीटी) में व्यक्ति को अपने विचारों और भावनाओं को पहचानने तथा उनके प्रति जागरूक होने में मदद की जाती है। इससे नकारात्मक सोच और उससे पैदा होने वाले व्यवहार में बदलाव लाने का प्रयास किया जाता है।
डॉ. आलोक मनदर्शन के अनुसार, गीता में भी जीवन के संघर्ष, मानसिक द्वंद्व और उनसे निकलने के रास्ते का विस्तृत वर्णन मिलता है। कुरुक्षेत्र में अर्जुन जब मानसिक द्वंद्व और निराशा से घिर गए थे, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें जीवन, कर्तव्य और परिस्थितियों को समझने की दृष्टि दी। इससे अर्जुन में आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच का संचार हुआ।
उन्होंने कहा कि मनोचिकित्सा में व्यक्ति को अपनी मानसिक स्थिति को समझने और उसके प्रति स्वस्थ दृष्टिकोण विकसित करने की क्षमता यानी ‘अंतर्दृष्टि’ महत्वपूर्ण होती है। इसके अभाव में नकारात्मक विचारों और व्यवहार में बदलाव मुश्किल हो जाता है।
डॉ. आलोक ने कहा कि आज के समय में बढ़ते तनाव और मानसिक परेशानियों के बीच गीता की शिक्षाओं को भावनात्मक और व्यावहारिक रूप से अपनाकर व्यक्ति अपनी व्यग्रता और नकारात्मक मनोदशा को नियंत्रित करने की दिशा में आगे बढ़ सकता है।