जलालपुर अंबेडकर नगर। गांव के गन्ने और धान के खेत अब सिर्फ फसल की खुशबू नहीं बिखेरते, वहां दर्द की तीखी गंध है। शनिवार की सुबह किताबों के साथ स्कूल निकली 17 वर्षीय छात्रा शाम होते-होते लाश बनकर लौटी। फटी शर्ट, अस्त-व्यस्त कपड़े और आंखों में अधूरी इच्छाओं का सूनापन। खेतों की मिट्टी पर लिखी यह कहानी सिर्फ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि पूरे समाज से किया गया सवाल है। हम अपनी बेटियों को आखिर कब तक सुरक्षित रख पाएंगे?
न्याय की डगर पर परिवार
रविवार को जब अयोध्या मंडल के आईजी प्रवीण कुमार गांव पहुंचे, तो उन्होंने पीड़ित परिवार की पीड़ा सुनी। परिजनों ने कांपते हुए शब्दों में कहा बेटी को पढ़ाकर अफसर बनाना चाहते थे, लेकिन उसे दरिंदगी का शिकार होना पड़ा। आईजी ने आश्वस्त किया दोषियों को ऐसी सजा दिलाई जाएगी, जो आने वाली पीढ़ियों को याद रहेगी।
सुरक्षा के घेरे में गांव, पर दिलों में डर
घटना के बाद से गांव छावनी में बदल चुका है। पुलिस की गाड़ियां, सायरन और वर्दीधारी जवान हर ओर हैं। लेकिन इन सबके बीच गांव की औरतों की आंखों में डर साफ झलकता है। हर मां अपनी बेटी को कसकर पकड़े हुए है। वे पूछ रही हैं—जब खेत ही बेटियों की कब्रगाह बन जाएं, तो उन्हें कहां भेजें?
अंतिम संस्कार की जद्दोजहद
पोस्टमार्टम के बाद जब शव गांव पहुंचा तो पूरा माहौल चीत्कार से भर गया। आंसुओं और चीखों के बीच परिवार ने शव दरवाजे पर रख दिया। उनका कहना था कि बेटी की मौत का दर्द सिर्फ चिता से नहीं मिटेगा, जब तक न्याय और भविष्य की गारंटी न मिले।
करीब ढाई घंटे तक प्रशासन परिजनों को मनाता रहा। आखिरकार शाम ढलते-ढलते राजी हुए परिजन और शव को नेमपुर घाट ले जाया गया। जलती चिता की लपटों में सिर्फ एक लड़की नहीं, बल्कि एक परिवार के सपने भी राख हो गए।
राजनीति बनाम संवेदनाएं
इस त्रासदी में राजनीति की हलचल भी गांव तक पहुंची। नेता आए, बयान दिए, सांत्वना के शब्द कहे। मगर ग्रामीणों की निगाहें पूछती रहीं—क्या ये वादे भी उसी धुएं की तरह हवा में उड़ जाएंगे, जैसे हमारी बेटी की चिता? भिस्वां चितौना अब खामोश है, लेकिन यह खामोशी किसी तूफान से कम नहीं। गली-कूचों में सिर्फ एक चर्चा है, बेटी को इंसाफ कब मिलेगा? यह सवाल प्रशासन, राजनीति और समाज तीनों के सामने है।