अयोध्या। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा सोहावल में आयोजित जनसभा के दौरान वर्ष 2003 के हनुमानगढ़ी इफ्तार प्रकरण का उल्लेख किए जाने के बाद यह मामला एक बार फिर चर्चा का विषय बन गया है। मुख्यमंत्री ने अपने संबोधन में कहा कि कभी हनुमानगढ़ी की सीढ़ियों पर नमाज पढ़वाने और रोजा इफ्तार कराने का प्रयास किया गया था, जबकि आज अयोध्या अपनी सांस्कृतिक विरासत और धार्मिक पहचान के अनुरूप आगे बढ़ रही है।
मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद दो दशक से अधिक पुराना यह विवाद फिर सार्वजनिक और राजनीतिक विमर्श में आ गया है। वर्ष 2003 में तत्कालीन महंत ज्ञानदास की पहल पर हनुमानगढ़ी परिसर के सामने रोजा इफ्तार का आयोजन किया गया था। उस समय प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार थी। आयोजन को एक पक्ष ने सांप्रदायिक सौहार्द का प्रयास बताया, जबकि संत समाज के कई लोगों और विभिन्न संगठनों ने इसे मंदिर की परंपराओं के विपरीत बताते हुए विरोध दर्ज कराया था।
2003 में क्या हुआ था?
दिसंबर 2003 में आयोजित इस कार्यक्रम में बाबरी मस्जिद पक्षकार हाशिम अंसारी, मुस्लिम नेता सादिक अली उर्फ “बाबू टेलर” समेत कई मुस्लिम प्रतिनिधि शामिल हुए थे। कार्यक्रम के दौरान नमाज अदा किए जाने की भी चर्चा रही। उस समय स्थानीय संतों, सामाजिक संगठनों और प्रशासन के कुछ अधिकारियों की ओर से इसका विरोध किया गया। विरोध बढ़ने के बाद मामला न्यायालय तक पहुंच गया और लंबे समय तक कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा बना रहा।
हाईकोर्ट की रोक के बाद नहीं हुआ दोबारा आयोजन
विवाद गहराने पर मामला इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ में पहुंचा। सुनवाई के दौरान अदालत ने मंदिर परिसर में इस प्रकार के आयोजनों पर अंतरिम रोक लगा दी थी। इसके बाद तत्कालीन महंत ज्ञानदास ने घोषणा की कि भविष्य में हनुमानगढ़ी परिसर में रोजा इफ्तार का आयोजन नहीं कराया जाएगा। तब से हनुमानगढ़ी परिसर में इस प्रकार का कोई आयोजन नहीं हुआ।
हालांकि वर्ष 2019 में अयोध्या के वशिष्ठ कुंड स्थित सरयू कुंज मंदिर परिसर में रोजा इफ्तार का आयोजन किया गया था, लेकिन उसका हनुमानगढ़ी प्रकरण से सीधा संबंध नहीं था।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के हालिया बयान के बाद वर्ष 2003 का यह विवाद एक बार फिर चर्चा में है और अयोध्या के धार्मिक एवं सामाजिक इतिहास से जुड़े इस प्रसंग पर नए सिरे से बहस शुरू हो गई है।