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संकल्प से सफर तक भाग : एक “देवभूमि उत्तराखंड की राह पर पहला कदम”

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✍️ मुकेश पांडेय की कलम से

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार व अयोध्या नगर निगम में जनसंपर्क अधिकारी हैं )


कुछ यात्राएँ अचानक बन जाती हैं, लेकिन जब पीछे मुड़कर देखते हैं तो लगता है कि उनका बीजारोपण बहुत पहले हो चुका था। देवभूमि उत्तराखंड की हमारी यह यात्रा भी कुछ ऐसी ही थी। यह केवल मंदिरों, पहाड़ों, नदियों, जंगलों के प्राकृतिक सौंदर्य को देखने का कार्यक्रम नहीं था, बल्कि निरंतर सार्वजनिक जीवन की भागदौड़ के बीच कुछ आत्मीय क्षण साथ बिताने, मन को तरोताजा करने और नई ऊर्जा के साथ लौटने का सामूहिक संकल्प था।

19 जून 2026 का दिन नगर निगम अयोध्या के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अयोध्या में रामायण वैक्स म्यूजियम तथा नगर निगम के अयोध्या धाम जोनल कार्यालय के उद्घाटन के लिए आए थे। स्वाभाविक रूप से इस पूरे आयोजन के केंद्र में महापौर महंत गिरीशपति त्रिपाठी थे। प्रत्येक व्यवस्था पर उनकी पैनी निगाह थी। कहीं कोई कमी न रह जाए, इसके लिए वह स्वयं लगातार विभिन्न स्थलों का निरीक्षण कर रहे थे। मुख्यमंत्री का दौरा समयानुसार संपन्न हुआ। उद्घाटन, निरीक्षणं और अन्य निर्धारित गतिविधियाँ बिना किसी व्यवधान के पूरी हुईं। शाम लगभग छह बजे जब मुख्यमंत्री अपने हेलीकॉप्टर से राजधानी लखनऊ के लिए रवाना हुए, तब नगर निगम परिवार ने राहत की साँस ली। सबसे बड़ी संतुष्टि इस बात की थी कि मुख्यमंत्री ने व्यवस्थाओं की खुले मन से सराहना की। यह प्रशंसा न केवल महापौर, उन सभी लोगों के लिए सम्मान थी, जिन्होंने कई दिनों तक मेहनत की थी।

 दिनभर की व्यस्तता के बावजूद महापौर अपने पैतृक आवास, तुलसी उद्यान के सामने स्थित गृहस्थ परंम्परा की प्रतिष्ठित पीठ तीन-कलश तिवारी मंदिर पहुँचे। मंदिर परिसर का वातावरण हमेशा की तरह शांत और आध्यात्मिक था। शाम ढलने लगी थी। वह विश्राम की मुद्रा में बैठे ही थे कि एक-एक कर उनके सहयोगी और आत्मीयजन वहाँ पहुँचने लगे। सबसे पहले दीपक शुक्ल आए, फिर अन्य सहयोगी भी आ गए। सभी के चेहरों पर सफलता की संतुष्टि स्पष्ट झलक रही थी।

आभार का सिलसिला शुरू हुआ। कोई व्यवस्थाओं की चर्चा कर रहा था, तो कोई वैक्स म्यूजियम की भव्यता और मुख्यमंत्री की प्रशंसा का उल्लेख कर रहा था। चाय की चुस्कियों के बीच बातचीत धीरे-धीरे भविष्य की योजनाओं की ओर मुड़ गई। तभी एक सहयोगी मुस्कराते हुए बोले, ष्इतने दिनों से लगातार काम ही काम हो रहा है। अब गर्मी भी समाप्त होने वाली है। क्यों न हम सब मिलकर कहीं घूमने चलें? बरसात शुरू हो जाएगी तो फिर ऐसा अवसर नहीं मिलेगा।

यह प्रस्ताव सभी को पसंद आया। दीपक ने तुरंत कहा, ” यदि चलना ही है तो देवभूमि उत्तराखंड चलना चाहिए। वहाँ दर्शन भी होंगे, प्रकृति का आनंद भी मिलेगा और साथ मिलकर कुछ अविस्मरणीय पल बिताने का अवसर भी।”

महापौर ध्यानपूर्वक सबकी बातें सुन रहे थे। उन्होंने मुस्कराकर कहा, ” यदि आप सबकी यही इच्छा है तो कार्यक्रम बनाया जा सकता है।”

इसके बाद तिथियों पर विचार शुरू हुआ। किसी ने 24 जून का सुझाव दिया, तो किसी ने 25 जून को अधिक उपयुक्त बताया। अंततः महापौर ने अपनी पूर्व निर्धारित बैठकों और कार्यक्रमों की सूची देखकर घोषणा की, ” 25 जून, गुरुवार को हम सभी अयोध्या से देवभूमि उत्तराखंड के लिए रवाना होंगे। “ यह घोषणा होते ही पूरे वातावरण में नया उल्लास भर गया।

इसी बीच महापौर की धर्मपत्नी श्रीमती राजलक्ष्मी तिवारी भी वहाँ आ गईं। उन्होंने भी इस प्रस्ताव का स्वागत किया। उनका मानना था कि निरंतर सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रहने वाले लोगों के लिए समय-समय पर ऐसी यात्राएँ आवश्यक होती हैं। इससे केवल शरीर को ही नहीं, मन को भी विश्राम मिलता है और कार्य करने की नई ऊर्जा प्राप्त होती है। अब यात्रा की रूपरेखा बनने लगी। तय हुआ कि सफर बस से किया जाएगा, ताकि सभी एक साथ रह सकें। सामूहिक भ्रमण का आनंद भी तभी है, जब रास्ते भर हँसी-ठिठोली, गीत-संगीत, चर्चा और आत्मीय संवाद चलते रहें। इसी उद्देश्य से वाद्य यंत्र साथ ले जाने तथा गायन-वादन में निपुण मित्रों को साथ ले चलने का निर्णय हुआ।

मैंने सुझाव दिया कि यात्रियों की सूची लगभग 40 लोगों की बनाई जाए और बस में कुछ सीटें खाली रखी जाएँ। अक्सर अंतिम समय में कुछ लोग जुड़ जाते हैं, जबकि कुछ अपरिहार्य कारणों से नहीं जा पाते। इस सुझाव का सभी ने समर्थन किया। महापौर ने यात्रियों की सूची तैयार करने तथा सभी से संपर्क स्थापित करने की जिम्मेदारी दीपक शुक्ल और अपने विश्वस्त सहयोगी इंद्रजीत शुक्ल को सौंपी। अगले ही दिन दोनों इस कार्य में जुट गए। 20 जून तक लगभग 30 से 35 संभावित यात्रियों की प्रारंभिक सूची तैयार हो गई।

इसके बाद व्यक्तिगत संपर्क का सिलसिला शुरू हुआ। प्रत्येक व्यक्ति से उसकी सुविधा, उपलब्धता और सहमति के बारे में बात की गई। कुछ नए नाम भी सामने आए, जिन्हें दल अपने साथ ले जाना चाहता था। देखते ही देखते यह केवल एक यात्रा न रहकर मित्रों और सहयोगियों का सामूहिक उत्सव बन गया।

21 जून को जौनपुर की एक निजी ट्रैवल कंपनी की आधुनिक सुविधाओं से युक्त बस बुक कर ली गई। देखने में आकर्षक इस बस में आरामदायक सीटों के साथ विश्राम की भी व्यवस्था थी। सभी को विश्वास था कि लंबा सफर आरामदायक रहेगा। 23 जून तक यात्रियों की सूची को अंतिम रूप दे दिया गया। इस दौरान कुछ लोगों ने स्वास्थ्य अथवा पूर्व निर्धारित कार्यक्रमों के कारण असमर्थता व्यक्त की। मधुकरिया संत एमबी दास स्वास्थ्यगत कारणों से नहीं जा सके, जबकि अनुज रोहित शर्मा और राहुल पाठक अपनी-अपनी व्यस्तताओं के कारण। दूसरी ओर कई नए लोगों ने साथ चलने की इच्छा जताई, जिन्हें स्वीकार कर सूची में स्थान दे दिया गया।

आखिरकार वह दिन भी आ गया, जिसका सभी को इंतजार था।

25 जून की सुबह तुलसी उद्यान के सामने स्थित तीन-कलश तिवारी मंदिर परिसर में सामान्य दिनों की अपेक्षा अधिक चहल-पहल थी। निर्धारित समय पर बस भी पहुँच गई। चालक ने मंदिर के सामने उसे खड़ा कर दिया। कोई पानी की बोतलें रखवा रहा था, तो कोई भोजन का सामान व्यवस्थित कर रहा था। बर्तन, गैस सिलेंडर, चूल्हा, फल, सूखा नाश्ता और अन्य आवश्यक सामग्री सावधानीपूर्वक वाहन में रखी जा रही थी। निरंकार पाठक, राहुल सिंह, श्रीनिवास शास्त्री, विनोद पाठक सहित लगभग 25 लोग वहीं सवार हो गए। जो सीधे वहाँ नहीं पहुँच सके थे, उन्होंने पंचवटी बाईपास पर मिलने की सूचना दे रखी थी। पूर्व पार्षद मनोज श्रीवास्तव, आलोक द्विवेदी, सुबोध चतुर्वेदी और सतीश पांडे वहीं दल में शामिल हुए। इंजीनियर रवि तिवारी के नेतृत्व में एक अन्य समूह नाका क्षेत्र में प्रतीक्षा कर रहा था। कुछ देर बाद वे भी कारवाँ का हिस्सा बन गए।

जैसे-जैसे बस आगे बढ़ती गई, उल्लास भी बढ़ता गया। सोहावल पहुँचने पर विपिनेश पांडे अपने साथियों के साथ पहले से प्रतीक्षा कर रहे थे। उनके हाथ में आमों से भरी एक बड़ी टोकरी थी। मुस्कराते हुए उन्होंने कहा,  ” इतनी लंबी यात्रा बिना आम के कैसे पूरी होगी? ” उनकी यह आत्मीय भेंट पूरे वातावरण में मिठास घोल गई।

यात्रा पूरे उत्साह के साथ आगे बढ़ रही थी, लेकिन कुछ ही समय बाद एक अप्रत्याशित समस्या सामने आ गई। बस का एयर कंडीशनर ठीक से काम नहीं कर रहा था। जून की उमस भरी गर्मी में यात्रियों को असुविधा होने लगी। पहले सभी को लगा कि थोड़ी देर में समस्या दूर हो जाएगी, लेकिन स्थिति जस की तस बनी रही।

कई बार चालक से शिकायत की गई। हर बार उसका एक ही उत्तर होता, ” बस थोड़ी देर में कूल हो जाएगी। लखनऊ पहुँचने तक महापौर ने स्वयं स्थिति का आकलन किया और स्पष्ट शब्दों में कहा, यदि अभी यह स्थिति है तो आगे पहाड़ों तक पहुँचना कठिन होगा। यात्रा के आनंद से समझौता नहीं किया जा सकता।”

बस को गुडंबा क्षेत्र में रोककर मैकेनिक से जाँच कराई गई। पता चला कि एसी की गैस लगातार रिस रही है। गैस भरने से कुछ समय के लिए राहत मिल सकती थी, लेकिन पूरी यात्रा इसी वाहन के भरोसे करना जोखिम भरा था। इस बीच लोगों ने आसपास घूमकर स्थानीय व्यंजनों का आनंद लिया। किसी ने लखनऊ का मशहूर बंद-मक्खन खाया, किसी ने आइसक्रीम का स्वाद लिया। कई लोगों ने चाय-पकौड़ी और छाछ का आनंद लिया। इस तरह बातचीत और हल्के जलपान के बीच समय सहजता से बीत गया।

 स्थिति का आकलन करने के बाद और पहाड़ी मार्ग को ध्यान में रखते हुए महापौर ने बिना देर किए निर्णय लिया कि इसी बस से आगे बढ़ना उचित नहीं होगा। वह तुरंत वैकल्पिक व्यवस्था में जुट गए। कुछ ही देर में जनेश्वर मिश्र पार्क के पास तीन वातानुकूलित अरर्वेनिया वाहन की व्यवस्था कर दी गई। जब तक नया वाहन पहुंचता, सभी सामने स्थित एक रेस्टोरेंट में चले गए। यह रेस्टोरेंट महापौर के परिचित एवं एकेडमिक काउंसलर त्र्यंबक तिवारी से जुड़ा था। पहले से सूचना मिलने के कारण भोजन की समुचित व्यवस्था करा दी गई थी। कई साथियों ने भोजन किया। उस दिन एकादशी होने के कारण महापौर सहित कुछ लोगों ने फलाहार ग्रहण किया।

थोड़ी देर बाद तीन अरर्वेनिया पहुँच गई। सभी ने मिलकर पुराने वाहन से पानी की बोतलें, फल, आमों की टोकरी, खाद्य सामग्री, बर्तन तथा अन्य आवश्यक सामान नए वाहनों में रख दिया। कुछ ही मिनटों में पूरा दल फिर से प्रस्थान के लिए तैयार था।

बस बदलने की इस छोटी-सी असुविधा ने किसी का उत्साह कम नहीं किया। उलटे सभी का विश्वास और दृढ़ हो गया कि जब नेतृत्व सजग हो तो कठिनाइयाँ केवल कुछ देर के लिए रास्ता रोकती हैं, मंजिल नहीं।

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