अयोध्या। अत्यधिक शक की प्रवृत्ति मानसिक रोग का रूप ले सकती है, जिसका समय पर उपचार न होने पर गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं। यह जानकारी जिला चिकित्सालय के मनोपरामर्शदाता डॉ. आलोक मनदर्शन ने यश स्किल्स में आयोजित मनोजागरूकता कार्यशाला के दौरान दी।
उन्होंने बताया कि शक का हल्का और मध्यम रूप पैरानॉयड पर्सनालिटी डिसऑर्डर (पीपीडी) तथा गंभीर रूप पैरानॉयड सिजोफ्रेनिया कहलाता है। देश में ऐसे मरीजों की संख्या बड़ी है और अधिकतर मरीज 20 से 45 वर्ष आयु वर्ग के होते हैं।
डॉ. मनदर्शन ने बताया कि ऐसे मरीज को भ्रम हो सकता है कि कोई उसके दिमाग को पढ़ रहा है या नियंत्रित कर रहा है। कुछ मामलों में व्यक्ति को षड्यंत्र, जहर देने या हमला करने का डर सताता है। जीवनसाथी या प्रेम संबंध में बेवफाई का शक भी गंभीर विवाद, आत्महत्या या हिंसा जैसी घटनाओं का कारण बन सकता है। कई मरीजों को अवास्तविक आवाजें, दृश्य या अन्य अनुभूतियां भी हो सकती हैं।
उन्होंने कहा कि इलाज में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका परिजनों की जागरूकता की होती है, क्योंकि मरीज अक्सर खुद को बीमार नहीं मानता। दवा और परामर्श के साथ व्यवहारिक चिकित्सा एवं पुनर्वास से सुधार संभव है। कार्यशाला में पैका फाउंडेशन की सलाहकार सरिता उपाध्याय, स्किल्स सलाहकार संकर्षण शुक्ला, प्रशिक्षक दीपक पांडेय सहित अनेक प्रशिक्षु उपस्थित रहे।