अयोध्या। डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के श्रीराम शोध पीठ सेमिनार हॉल में आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी ‘रोल ऑफ इंडियन नॉलेज सिस्टम फॉर अचीविंग द गोल ऑफ इंडिया 2047’ का शनिवार को समापन हो गया। कार्यक्रम कुलपति कर्नल बिजेंद्र सिंह के मार्गदर्शन में संपन्न हुआ।
समापन सत्र के मुख्य अतिथि सहायक नगर आयुक्त गुरु प्रसाद पांडेय ने कहा कि भारत की शिक्षा प्रणाली ऋषि परंपरा पर आधारित रही है, जिसकी जड़ें वेदों में निहित हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति ने परिवर्तनशीलता की शक्ति को विश्व में सबसे पहले पहचाना। यही कारण है कि भारतीय ज्ञान प्रणाली समय के साथ स्वयं को रूपांतरित करते हुए भी अपनी मूल आत्मा को सुरक्षित रखे हुए है। श्रुति परंपरा के माध्यम से ज्ञान और नैतिक मूल्यों का पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचरण भारतीय शिक्षा की विशेषता रही है।
विशिष्ट अतिथि प्रो. रमेश कुमार शर्मा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा में शिक्षा केवल जानकारी प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और आत्म-साक्षात्कार का मार्ग है। उन्होंने ‘सा विद्या या विमुक्तये’ के सिद्धांत का उल्लेख करते हुए कहा कि प्राचीन भारतीय शिक्षा मुक्ति और आत्मबोध पर आधारित थी। गुरु-शिष्य परंपरा को भारतीय शिक्षण पद्धति की आधारशिला बताते हुए उन्होंने गुरु को मार्गदर्शक और आध्यात्मिक संरक्षक बताया।
सातवें तकनीकी सत्र की अध्यक्षता अधिष्ठाता छात्र कल्याण प्रो. नीलम पाठक एवं डॉ. राजेश कुमार सिंह ने की। प्रो. पाठक ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल आध्यात्मिक या धार्मिक विमर्श तक सीमित नहीं है, बल्कि यह वैज्ञानिक, तार्किक और अनुभवाधारित चिंतन पर आधारित है। डॉ. राजेश सिंह ने भारतीय संस्कृति के 16 संस्कारों की व्याख्या करते हुए कहा कि ये व्यक्ति के जन्म से लेकर मृत्यु तक के संपूर्ण विकास के मील के पत्थर हैं तथा इनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण भी समाहित है।