Saturday, March 7, 2026
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ड्रग्स का है एडिक्टिव-हार्मोन कनेक्शन 


◆ मौज मस्ती से शुरुवात बनाती है तलबगार


 ◆ मनोपरामर्श है लत छोड़ने मे सहायक


अयोध्या। राजकीय पालिटेक्निक में विश्व नशारोधी दिवस 26 जून संदर्भित सब्स्टेंस-यूज़ डिसऑर्डर जागरूकता कार्यशाला में डा आलोक मनदर्शन ने बताया कि किशोरों में छद्म सुकून व मौज- मस्ती की अनुभूति के चंगुल में फंसकर नशे की लत बढ़ती जा रही हैं। पारम्परिक छोटे नशे से शुरु होकर ओपिआयड- पदार्थो, नारकोटिक -टेबलेट, सिरप व इंजेक्शन तक यह जा सकती  है। नशे के प्रमुख शॉर्ट-टर्म दुष्प्रभावों में एकाग्रता की कमी, पढ़ाई में मन न लगना,आँखों का धुंधलापन व लाल होना, चिड़चिड़ापन, क्रोधित व ठीट स्वभाव, भूख कम या ज्यादा लगना, अनिद्रा, साइबर सेक्स व गेम में मस्त रहना, रैस ड्राइविंग,  यौन सक्रियता, हिंसा जैसे व्यवहार दिखतें हैं ,वही लॉन्ग-टर्म इफ़ेक्ट मनोविक्षिप्ता से लेकर लीवर,किडनी आदि के लिए घातक होते हैं । नशीले पदार्थ के सेवन से ब्रेन न्यूक्लियस में एडिक्टिव-हार्मोन डोपामिन की बाढ़ आ जाती है और मस्ती का एहसास होने लगता है  फिर डोपामिन का स्तर सामान्य होने पर हिप्पोकैम्पस द्वारा  डोपामिन की तलब पैदा होती है जिसे ड्रग-डिपेंडेंस कहा जाता है। इस प्रकार नशे की मात्रा बढ़ती जाती है जिसे ड्रग-टोलेरेन्स  कहा जाता है। मनोविकार से ग्रसित या नशे की पारिवारिक पृष्ठभूमि या मित्रमण्डली से सरोकार के टीनेज व यूथ में यह अधिक होता है। एक स्टडी के अनुसार, दो तिहाई ड्रग-यूजर्स की लत  किशोरवस्था में ही शुरु होती है ।

बचाव व उपचार:  यदि  किशोर के व्यवहार में असामान्यता दिखने लगे तो अभिभावक उसकी गतिविधियों पर मैत्रीपूर्ण व पैनी नजर रख उसके गोपनीय नशे की लत के बारे में जाने व जागरूक करें। फिर भी यदि लत के लक्षण दिखें तो निःसंकोच मनोपरामर्श ले।  कागनिटिव थिरैपी व ड्रग- रिप्लेसमेंट थेरैपी नशे से उबारने में कारगर है। कार्यशाला की अध्यक्षता प्रिंसिपल जयराम ने किया जिसमें सभी टीचर व स्टूडेंट मौजूद रहे।

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