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संकल्प से सफर तक भाग -दो रात का सफर और गंगा की ओर बढ़ता काफिला

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✍️ मुकेश पांडेय की कलम से

(लेखक वरिष्ठ स्तंभकार व अयोध्या नगर निगम में जनसंपर्क अधिकारी हैं )


◆ शाहजहांपुर और नजीबाबाद की चाय के साथ एक यादगार रात्रि यात्रा


नए उत्साह, असीम उत्सुकता और यात्रा के रोमांच से भरे मन के साथ हम सभी “अरर्वेनिया” नामक तीन वाहनों के साथ रात के सन्नाटे को चीरते हुए निकल पड़े। घड़ी की सुइयाँ जैसे-जैसे आगे बढ़ रही थीं, वैसे-वैसे हमारी यात्रा लखनऊ की जगमगाती रोशनी को पीछे छोड़ती हुई गंगा एक्सप्रेस-वे की दिशा में अग्रसर हो रही थी।

लखनऊ की सीमाओं को पार करना निरंतर जाम के कारण अपने आप में एक छोटा सा ही सही पर चुनौती भरा संघर्ष था। शहर की रफ्तार, ट्रैफिक की धीमी चाल और रात की हल्की चहल-पहल ने हमें लगभग एक घंटे से अधिक समय तक अपनी गिरफ्त में रखा, लेकिन जैसे ही शहर की अंतिम रोशनी पीछे छूटीं, सड़कें खुलने लगीं और यात्रा ने अपनी असली गति पकड़ ली। अब सामने था, लंबा सफर, गहरी रात और भीतर उमड़ता हुआ उत्साह।

रात लगभग दस बजे का समय रहा होगा, जब पहली बार यह एहसास हुआ कि अब हम शहरों की दुनिया से निकलकर ग्रामीण भारत की ओर बढ़ रहे हैं। सड़क के दोनों किनारों पर अंधेरे के बीच-बीच में टिमटिमाती रोशनियाँ, ऐसा लग रही थीं कि मानो वह यात्रा को दिशा दे रही हों। अब हवा में एक अलग ही ठंडक घुलने लगी थीं और दूर-दूर तक फैले खेतों से उठती मिट्टी की सोंधी खुशबू यह संकेत दे रही थी कि हम उत्तर प्रदेश के हृदय में प्रवेश कर रहे हैं।

यात्रा का पहला बड़ा पड़ाव शाहजहांपुर निर्धारित था। सभी साथियों की एक ही सहमति थीकृ“अगली चाय शाहजहांपुर में ही होगी।” यह केवल चाय नहीं थी, बल्कि यात्रा का विराम, उत्साह का पुनर्जन्म और थकान से मुक्ति का माध्यम भी थी। लखनऊ से आगे बढ़ते हुए हरदोई का क्षेत्र सामने आ गया। कृषि प्रधान इस जनपद के विस्तृत खेत रात के अंधेरे में किसी शांत समुद्र की भाँति प्रतीत हो रहे थे। सड़क किनारे बसे छोटे-छोटे गाँवों की मद्धिम रोशनियाँ इस बात का संकेत दे रही थीं कि जीवन यहाँ सादगी के साथ, लेकिन निरंतर प्रवाहित हो रहा है।

लगभग दो से तीन घंटे की निरंतर यात्रा के बाद हम शाहजहांपुर जनपद की सीमा में प्रवेश कर चुके थे। क्रांतिकारियों की यह भूमि अपने भीतर स्वतंत्रता संग्राम की गौरवगाथाएँ समेटे हुए है। रात के सन्नाटे में इतिहास की गूंज स्पष्ट महसूस हो रही थी। यहाँ हमने लगभग आधे घंटे का विश्राम लिया। एक छोटे ढाबे पर गरमागरम चाय तैयार थी। चाय की चुस्की ली गई तो थकान विगलित हो गई। किसी ने हाथ-मुँह धोकर ताजगी महसूस की तो किसी ने आगे की यात्रा पर चर्चा शुरू कर दी। शाहजहांपुर की यह चाय केवल स्वाद नहीं थी, बल्कि यात्रा की ऊर्जा बन गई थी।

यहां कुछ साथियों ने स्थानीय लोगों से संवाद भी किया। ढाबे वाले ने बताया कि यह स्थल रात्रि यात्रियों का प्रमुख ठहराव बिंदु है। यहाँ रुककर लोग न केवल विश्राम करते हैं, बल्कि आगे की यात्रा के लिए स्वयं को पुनः तैयार करते हैं। अब हमारा गंतव्य नजीबाबाद की ओर था, जो बिजनौर जनपद से होकर गुजरता है। जैसे-जैसे हम पश्चिम की ओर बढ़ रहे थे, सड़कें अधिक निर्जन होती जा रही थीं। गंतव्य तक पहुंचने की जल्दी नहीं थी, इसलिए वाहन की गति स्थिर थी। इस दौरान कुछ साथियों ने ताश के पत्तों का खेल शुरू कर दिया, जिससे माहौल हल्का-फुल्का चुहल भरा बन गया। यात्रा अब केवल सफर नहीं रही थी, बल्कि एक आंदोत्सव बन चुकी थी।

बरेली और बदायूं क्षेत्र पार करते हुए हम पश्चिमी उत्तर प्रदेश की उस भूमि में प्रवेश कर रहे थे, जहाँ कृषि, संस्कृति और व्यापार का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। बरेली अपनी झुमके की परंपरा और व्यापारिक पहचान के लिए प्रसिद्ध है, जबकि बदायूं सूफी परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत का केंद्र है। यह हर किसी के  जेहन में कौंध रही थी।

अब तक मुरादाबाद की ओर बढ़ते हुए यह स्पष्ट होने लगा कि हम अब गंगा के मैदानी क्षेत्र के और निकट पहुँच रहे हैं। मुरादाबाद पीतल की विश्वप्रसिद्ध शिल्पकला और अंतरराष्ट्रीय पहचान का प्रतीक है। धीरे-धीरे हम बिजनौर जनपद में प्रवेश कर चुके थे और नजीबाबाद की ओर बढ़ते हुए वातावरण में नमी बढ़ने लगी थी। यहाँ एक और छोटा पड़ाव लिया गया। चाय का एक और दौर चला, लेकिन इस बार उसका स्वाद अलग था।

अब हम गंगा के और निकट थे। यात्रा अपने अंतिम चरण में पहुँच चुकी थी। नजीबाबाद से आगे जैसे ही हम उत्तराखंड की सीमा की ओर बढ़े, वातावरण बदलने लगा। सड़कें अधिक स्वच्छ, हवा अधिक ठंडी और मन अधिक सजग हो गया। सूर्योदय के समय जब हमने उत्तर प्रदेश की सीमा पार कर उत्तराखंड के हरिद्वार जिले में प्रवेश किया, वह क्षण अविस्मरणीय था। गंगा की पवित्रता का आभास हवा में घुल चुका था।

हरिद्वार में प्रवेश करते ही यात्रा का स्वरूप बदल गया। अब केवल सफर नहीं, आध्यात्मिक अनुभव का एहसास हो रहा था। इस पूरी रात्रिकालीन यात्रा में शाहजहांपुर और नजीबाबाद की चाय, रास्तों के गाँव, खेतों की सोंधी खुशबू ने इस सफर को एक ऐसी स्मृति में बदल दिया, जो जीवनभर साथ रहने वाली थी।

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