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अमित मिश्र, अयोध्‍या समाचार


  • भगवान राम तथा माता सीता का निज भवन था कनक भवन


  • संतों का अनुभव है कनक भवन में भगवान श्रीराम-जानकी करते है भ्रमण


भगवान राम तथा माता सीता का निज भवन जिसे कनक भवन के नाम से जाना जाता वह परम दिव्यताशक्ति  और सौन्दर्य का प्रतीक हैं। कनक भवन राम विवाह के पश्‍चात् माता कैकई के द्वारा सीता जी को मुंह दिखाई में दिया गया था। जिसे भगवान राम तथा सीता जी ने अपना निज भवन बना लिया। उस समय का यह भवन चौदह कोस में फैली अयोध्‍या नगरी में स्थित सबसे दिव्‍य तथा भव्‍य महल था। कनक भवन ततसमय पांच कोस में फैला हुआ था। 

 


कनक भवन 


 धार्मिक आख्‍यानों के अनुसार कनक भवन का निर्माण महारानी कैकेयी के अनुरोध पर अयोध्‍या के राजा दशरथ द्वारा विश्वकर्मा की देखरेख में श्रेष्ठ शिल्पकारों के द्वारा कराया गया था। मान्‍यताओं के अनुसार कनक भवन के किसी भी उपभवन में पुरूषों का प्रवेश वर्जित था। भगवान के परम भक्‍त हनुमान जी को भी बहुत अनुनय विनय करने के बाद आंगन में ही स्‍थान मिल पाया। इसी मान्यता के तहत कनक भवन के गर्भगृह में भगवान श्रीराम-जानकी के अलावा किसी अन्य देवता का विग्रह स्थापित नहीं किया गया है।

त्रेता युग में भगवान राम के श्रीधाम जाने के बाद उनके पु्त्र कुश ने कनक भवन में रामसीता के मूर्तियां स्‍थ‍ापित की । यह भवन अयोध्‍या के पराभव के बाद जर्जर हो गया। आख्‍यानों के अनुसार कनक भवन से विक्रमादित्‍य कालीन एक शिलालेख प्राप्‍त हुआ जिसके अनुसार द्वापर युग में जब कृष्ण जरासंध का वध करने के उपरान्‍त प्रमुख तीर्थों की यात्रा करते हुए अयोध्या आए तो कनक भवन के टीले पर एक पद्मासना देवी को तपस्या करते हुए देखा और टीले का जीर्णोद्धार करवाकर मूर्तियाँ पुनस्थापित की। इसी शिलालेख में ही आगे वर्णन है संवत् 2431 आज से लगभग 2070 वर्ष पूर्व को समुद्रगुप्त ने भी इस भवन जीर्णोद्धार करवाया। सन् 1761 ई. में भक्त कवि रसिक अलि ने कनक भवन के अष्टकुंज का जीर्णोधार करवाया था।

वर्तमान के कनक भवन का निर्माण ओरछा राज्‍य के राजा सवाई महेन्द्र श्री प्रताप सिंह की पत्नी महारानी वृषभानु कुंवरि की देखरेख में कराया गया था। सन् 1891 ई. को उनके द्वारा  प्राचीन मूर्तियों की पुनस्र्थापना के साथ ही राम सीता की दो नये विग्रहों की भी प्राण प्रतिष्ठा करवाई गई । मंदिर के गर्भगृह के पास ही शयन स्थान है जहां भगवान राम शयन करते हैं। इस कुन्ज के चारों ओर आठ सखियों के कुंज हैं। जिन पर उनके चित्र स्‍थापित किए गये है । सभी सखियाँ की भिन्न-भिन्न सेवाएँ हैं। । चारुशीला, जो भगवान के मनोरंजन तथा क्रीड़ा के लिये प्रबन्ध करती थी इसी प्रकार क्षेमा, हेमा, वरारोहा, लक्ष्मण, सुलोचना, पद्मगंधा, सुभगा की भगवान के लिए सेवाएं भिन्‍न भिन्‍न है। ये आठों सखियां भगवान राम  की सखियाँ कही जाती हैं। इनके अतिरिक्त आठ सखियाँ और हैं जिन्‍हे सीताजी की अष्टसखी कही जाती हैं। उनमें चन्द्र कला, प्रसाद, विमला, मदन कला , विश्व मोहिनी,  उर्मिला, चम्पाकला, रूपकला  हैं। मान्यता है कि किशोरी जी प्रतिदिन श्रीराम को उनके भक्तों अर्थात भक्तमाल की कथा सुनातीं है। इसी भावना के तहत भक्तमाल की पुस्तक भी रखी रहती है। जानकी संग भगवान श्रीराम प्रतिदिन चौपड़ भी खेलते हैं, इसके लिए चौपड़ की भी व्यवस्था की गयी है।

  संतों को ऐसा अनुभव रहा है कि कनक भवन में भगवान श्रीराम-जानकी संग भ्रमण भी करते-रहते हैं। चैत्र रामनवमी, सावन झूलनोत्सव, अन्नकूट, दीपावली श्रीहनुमत्-जयन्ती, महालक्ष्मी पूजन, दीपावली, अन्नकूट, तथा ग्यारस (देव उत्थानी एकादशी आदि पर्व मंदिर में धूमधाम से मनाया जाता है।