अयोध्या। अयोध्या के पौराणिक बृहस्पति कुंड का करोड़ों रुपये से जीर्णोद्धार और भव्य लोकार्पण, जहाँ दक्षिण भारत के तीन संतों — श्री त्यागराज स्वामीगल, श्री पुरंदरदास और श्री अरुणाचल कवि — की प्रतिमाएँ स्थापित की गई हैं, उसी परिप्रेक्ष्य में सिद्ध पीठ हनुमान निवास के आचार्य डॉ. मिथिलेश नंदिनी शरण ने चिंता व्यक्त की है। उनका सवाल है — बृहस्पति कुंड में देवगुरु बृहस्पति की मूर्ति कहां है?
आचार्य ने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा है कि अयोध्या संवर रही है, बड़ी परियोजनाओं और धनराशियों से जगमगाती अयोध्या में आम नागरिकों की आंखों की रोशनी छीनी जा रही है। उन्होंने कहा कि यह तीर्थ स्थल सरकारी-अतिक्रमण के बाद अब हवन कुंड जैसा रह गया है, जहाँ बृहस्पति के दर्शन नहीं होते।
वीआईपी आवागमन से घंटों बंद रास्ते
आचार्य ने इस बात पर भी नाराजगी जताते हुए लिखा कि “लगभग प्रति सप्ताह वीआईपी आवागमन से घण्टों बन्द रास्ते, बड़ी राजनैतिक महत्त्वाकांक्षा में मँडराते और स्थानीय कठिनाइयों की सतत उपेक्षा करते नेता। अनियोजित निर्माण-प्रक्रिया में मनमानी करते ठेकेदार, बैटरी रिक्शा का अनियन्त्रित और असुरक्षित रेला..यही हमारी अयोध्या है।
अयोध्या की पहचान खतरे में
आचार्य ने लिखा कि “श्रीरामजन्मभूमि संघर्ष का परिणाम मिल चुका है, पर क्या इस मूल्य के बदले अयोध्या की अस्मिता छीन ली जानी चाहिए?” उन्होंने कहा कि बजट, सड़क निर्माण और रोजगार की दृष्टि में काम करने के बावजूद अयोध्या का इतिहास और भूगोल राजनीतिक खेल में खो रहा है।
बने तो राम से बने, चाहे सब बिगड़ जाए
आचार्य ने समाप्त करते हुए कहा — “बने तो राम से बने, चाहे सब बिगड़ जाए। हमें अपने प्रभु के अतिरिक्त किसी से अपना हित नहीं चाहिए।” उन्होंने स्पष्ट किया कि अयोध्या के वर्तमान बदलाव में इतिहास, संस्कृति और आस्था को बचाना अत्यंत आवश्यक है।