अम्बेडकर नगर। जनपद मुख्यालय स्थित बी. एन. के. बी. पी. जी.कॉलेज, अकबरपुर में ‘आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ’ के तत्त्वावधान में ‘ हिंदी की वैश्विक उपस्थिति’ विषय पर एकल व्याख्यान का आयोजन किया गया। एकल व्याख्यान के मुख्य वक्ता पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा, पंजाब के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. राजकुमार उपाध्याय मणि और विशिष्ट अतिथि हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. सत्यप्रकाश त्रिपाठी रहे। कार्यक्रम की अध्यक्षता महाविद्यालय की प्राचार्य प्रो. शुचिता पांडेय, संयोजन आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ के समन्यवक प्रो.सिद्धार्थ पांडेय के दिशा-निर्देश में डॉ. शशांक मिश्र और संचालन वागीश शुक्ल ने किया। कार्यक्रम का शुभारंभ माँ सरस्वती की प्रतिमा पर दीप-प्रज्ज्वन और पुष्पार्पण करके अतिथियों ने किया।
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए महाविद्यालय की प्राचार्य प्रो. शुचिता पांडेय ने कहा कि आज का समय भूमंडलीकरण का है, जिसका असली चेहरा बाजार के रूप में हमारे सामने उपस्थित हुआ है। तेजी से फैलती बाजार-संस्कृति ने हमारी राष्ट्रीय अस्मिता, खानपान, पहनावा, भाषा, संस्कृति आदि को प्रभावित किया है। भाषाओं के इस विलुप्तीकरण के दौर में हिंदी अपने को न केवल बचाने में सफल हो रही है, बल्कि उसका उपयोग-अनुप्रयोग निरंतर बढ़ता जा रहा है। यह भाषा लगभग डेढ़ हजार वर्ष पुरानी है और इसमें डेढ़ लाख शब्दावली समाहित है। संप्रति हिंदी को अंतरराष्ट्रीय दर्जा प्राप्त है, क्योंकि यह अनेक विदेशी भाषाओं को न केवल स्वीकार करती, बल्कि विश्व की समस्त भाषाओं को आत्मसात करने की क्षमता रखती है।
मुख्य वक्ता डॉ. राजकुमार उपाध्याय मणि ने अपने वक्तव्य में कहा कि आज के वैश्विक फलक पर हिंदी स्वयं को एक संपर्क भाषा, प्रचार भाषा और राजभाषा के साथ-साथ वैश्विक भाषा के रूप में स्वयं को स्थापित करती जा रही है। विश्व के लगभग एक सौ चालीस देशों के लगभग पांच सौ केंद्रों में हिंदी का अध्ययन-अध्यापन हो रहा है, जहां न जाने कितने विद्वान अपना योगदान दे रहे हैं। कंप्यूटर, मोबाइल और आइ-पैड पर हिंदी की पहुंच ने यह बात सिद्ध कर दी है कि आने वाले समय में इंटरनेट की भाषा अंग्रेजी न होकर हिंदी होगी। अगर हिंदी के वैश्विक परिदृश्य पर बात करें तो जापान में हिंदी की पढ़ाई हिंदुस्तानी के रूप में सन 1908 से प्रारंभ हुई, जिसे ज्यादातर व्यापार करने वाले लोग पढ़ाया करते थे, पर बाद में इसका पठन-पाठन विशेषज्ञ शिक्षकों द्वारा किया जाने लगा। अगर संख्या बल पर ध्यान दें तो पूरे यूरोप की आबादी पैंतीस करोड़ है, जबकि भारत की जनसंख्या लगभग एक सौ तीस करोड़ है। इस तरह अगर हमारे यहां पचास प्रतिशत आबादी हिंदी पढ़ती-लिखती है, तो वह पूरे यूरोप से कहीं ज्यादा है।
अमेरिका में हिंदी फिल्मी गीतों के माध्यम से पढ़ाई जाती है और प्रवासी भारतवंशी हिंदी की अलख और संस्कृति को जगाए रखे हैं। अमेरिका में हिंदी के विकास में चार संस्थाएं प्रयासरत हैं, जिनमें अखिल भारतीय हिंदी समिति, हिंदी न्यास, अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति प्रमुख हैं। अमेरिका की भाषा नीति में दस नई विदेशी भाषाओं को जोड़ा गया है, जिनमें हिंदी भी शामिल है।
दूर देश से निकलने वाली हिंदी पत्रिकाओं ने भी हिंदी को वैश्विक फलक पर ले जाने में उल्लेखनीय भूमिका निभाई है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी को बढ़ावा देने वाली संस्थाओं में अंतरराष्ट्रीय हिंदी समिति (संयुक्त राज्य अमीरात), मॉरीशस हिंदी संस्थान, विश्व हिंदी सचिवालय, हिंदी संगठन (मॉरीशस,) हिंदी सोसाइटी (सिंगापुर), हिंदी परिषद (नीदरलैंड) आदि ने महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। आज हिंदी जो वैश्विक आकार ग्रहण कर रही है उसमें रोजी-रोटी की तलाश में अपना वतन छोड़ कर गए गिरमिटिया मजूदरों के योगदान को कभी नहीं भुलाया जा सकता। मसलन, एशिया के अधिकतर देशों चीन, श्रीलंका, कंबोडिया, लाओस, थाइलैंड, मलेशिया, जावा आदि में रामलीला के माध्यम से राम के चरित्र पर आधारित कथाओं का मंचन किया जाता है। वहां के स्कूली पाठ्यक्रम में रामलीला को शामिल किया गया है। हिंदी की रामकथाएं भारतीय सभ्यता और संस्कृति का संवाहक बन चुकी हैं। रेडियो सीलोन और श्रीलंकाई सिनेमाघरों में चल रही हिंदी फिल्मों के माध्यम से हिंदी की उपस्थिति समझी जा सकती है।
विशिष्ट अतिथि प्रो. सत्यप्रकाश त्रिपाठी ने अपने संबोधन में कहा कि हिंदी आज सिर्फ साहित्य की भाषा नहीं, बल्कि बाजार की भी भाषा है। उपभोक्तावादी संस्कृति ने विज्ञापनों को जन्म दिया, जिससे न केवल हिंदी का अनुप्रयोग बढ़ा, बल्कि युवाओं को रोजगार के नए अवसर भी मिले। बहुराष्ट्रीय कंपनियां इस बात से भलीभांति अवगत हैं कि भारत उनके उत्पाद का बड़ा बाजार है और यहां के अधिकतर उपभोक्ता हिंदीभाषी हैं। बाजार हमेशा लाभ पर केंद्रित होता है और लाभ केंद्रित व्यवस्था दीर्घजीव नहीं होती। एक समय के बाद उसका पतन निश्चित है, इसलिए हमें हिंदी को ज्ञान और संचार की भाषा के रूप में विकसित करना होगा। किसी देश के विकास के लिए आवश्यक है कि वहां ज्ञान-विज्ञान की भाषा जनमानस द्वारा ग्राह्य हो और वह उसे आसानी से समझ सके। इसलिए हिंदी के उपभोक्तावादी रूप के विकास की चुनौतियों को समझना होगा और इसे ज्ञान की भाषा के रूप में विकसित करना होगा, तभी इसका भविष्य सुरक्षित हो सकता है।
इस अवसर पर प्रो. श्वेता रस्तोगी, डॉ. विवेक तिवारी, विजय गुप्ता, मनोज श्रीवास्तव, हरिओम शर्मा, सुरेंद्र सिंह, दिनेश कुमार, डॉ. अनिल कुमार, डॉ. कमल त्रिपाठी, डॉ. अतुल मिश्र, डॉ रवि कुमार, सुधीर मिश्र,आशीष चतुर्वेदी, अंचल चौरसिया, हरिकेश यादव, सुमित्रा पटेल, बृजेश रजक, विनय कुमार, अरविंद यादव,सन्तोष कुमार, मो. सलमान, धनंजय मौर्य समेत बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे।