◆ बेचैनी और उलझन का व्यक्तित्व से भी जुड़ाव, सीबीटी से बदल सकती है सोचने की प्रवृत्ति
अयोध्या। कभी-कभार चिंतित या सशंकित होना सामान्य है, लेकिन बिना ठोस कारण लगातार चिंता, शक या भय बने रहना मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्या का संकेत हो सकता है। सामान्य शारीरिक लक्षणों को किसी गंभीर बीमारी का संकेत मानकर लगातार आशंकित रहना इलनेस एंग्जायटी डिसऑर्डर यानी रोग-चिंता विकार कहलाता है। ऐसे में व्यक्ति बार-बार अपनी सेहत को लेकर परेशान रहता है और जांच सामान्य आने के बावजूद उसकी चिंता कम नहीं होती।
यह बातें डॉ. राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी के सेंट्रल कंप्यूटर लैब सभागार में आयोजित एंग्जायटी डिसऑर्डर जागरूकता कार्यशाला में डॉ. आलोक मनदर्शन ने कहीं। उन्होंने बताया कि अत्यधिक चिंता और घबराहट का असर व्यक्ति की मानसिक स्थिति के साथ उसके शारीरिक स्वास्थ्य पर भी दिखाई दे सकता है।
डॉ. मनदर्शन के अनुसार, पैनिक अटैक के दौरान तेज धड़कन, सीने में भारीपन, घुटन, पेट दर्द, सिर दर्द, मांसपेशियों में ऐंठन, सुन्नपन और बेहोशी जैसा अनुभव हो सकता है। इन लक्षणों से व्यक्ति भयभीत हो जाता है। कई बार इंटरनेट पर लक्षणों की खोज उसकी आशंकाओं को और बढ़ा देती है। वह सामान्य शारीरिक संवेदनाओं को भी किसी गंभीर बीमारी का संकेत मानने लगता है।
उन्होंने कहा कि चिंता से जुड़ी समस्याओं के प्रति स्वीकार्यता की कमी, सामाजिक वर्जनाएं और संकोच लोगों को समय पर मनोवैज्ञानिक परामर्श लेने से रोकते हैं। लगातार बनी रहने वाली चिंता, बेचैनी या अनावश्यक भय को नजरअंदाज करने के बजाय विशेषज्ञ से सलाह लेनी चाहिए।
सीबीटी से सोचने के तरीके में बदलाव संभव
डॉ. मनदर्शन ने बताया कि कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (सीबीटी) के माध्यम से व्यक्ति की नकारात्मक सोच, अनावश्यक आशंकाओं और व्यवहार के उन पैटर्न पर काम किया जाता है, जो चिंता को बनाए रखते हैं। मस्तिष्क की अनुभवों के आधार पर अपने कार्य करने के तरीके में बदलाव लाने की क्षमता को न्यूरोप्लास्टिसिटी कहा जाता है। उचित मनोचिकित्सा और अभ्यास से व्यक्ति चिंता से निपटने के अधिक स्वस्थ तरीके सीख सकता है।
कार्यशाला का आयोजन संस्थान के निदेशक प्रो. हिमांशु सिंह के निर्देशन तथा डॉ. आशीष पांडेय के संयोजन में हुआ। इसमें संस्थान के शिक्षकगण और विद्यार्थियों ने प्रतिभाग किया।