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अपने आवास को बनाया छात्रावास खुद रहते थे छोटे कमरें में


शिक्षक दिवस, साक्षरता दिवस  के आयोजनों में नही लिया गया आचार्य नरेन्द्र देव का नाम


महान शिक्षाविद् व समाजवादी की कर्मभूमि रहा है फैजाबाद 


फैजाबाद। अतीत से अनजान होने की हालत यह है कि दूसरों का ज्ञान का उजियारा दिखाने वाली जमात को बाहरी तो दूर इस धरती से जुड़े पुरोधा तक की सुधि नही है। आम दिनों में चर्चा न हो सामान्य सा है पर अवसर विशेष पर भी उस शख्सियत का जिक्र न हो जिसका नाम शिक्षा के क्षितिज पर ध्रुव तारे  समान है। जिस शिक्षाविद को अपना सरपरस्त बनाने के लिए किसी जमाने में लखनऊ और वाणारसी के छात्र सकड़ो पर उतर आये और नारा गूंजा हमारा आचार्य हमें चाहिए।

समाजवादी आंदोलन में विश्वस्तर पर चर्चित रहे आचार्य नरेन्द्र देव महान शिक्षाविद् भी थे। अनुशासन के मामले में घोर कठोर लेकिन छात्र की मदद के मामले में स्नेह का सागर उनमें समाया था। देश में आजादी की किरण बिखेरने के बाद लखनऊ विश्वविद्यालय के कुलपति का दायित्व सम्हालने वाले आचार्य नरेन्द्र देव केवल प्रशासन का काम ही नही निपटाते थे बल्कि कई क्लास लेकर छात्रों को पढते थे। अनुशासन के मामले में इतने कठोर कि हाथ में बेत लिए घोड पर बैठे-बैठे क्लास रूम में घुस जाते थे। परिसर में धूमने के साथ ही सुबह शाम छात्रावास का नियमित निरीक्षण भी करते थे। 

लेकिन उसी व्यक्तित्व मे उदारता और स्नेह का सागर भी हिलोरे लेता रहता था। आचार्य जी ने कुलपति आवास को गरीब छात्रों का छात्रावास बना दिया था। इसका खर्चा वे खुद वहन करते थे। कुलपति ने आवास के एक छोटे से कमरें मंे अपनी गृहस्थी समेट रखी थी। खाना सामूहिक रुप से बनता था। जो खाना सभी खाते थे वहीं आचार्य भी खाते थे। इसके अलावा गरीब छात्रों के वस्त्र और पुस्तकों का भी सम्बंध आचार्य जी निजी श्रोत से करते थे। उस जमाने में उनकी यह ख्याति पूरे देश में बिखरी थी। 

उसी जमाने में जब बनारस हिन्दु विश्वविद्यालय का कार्यकाल पूरा हुआ तो मुख्यमंत्री डा सम्पूर्णानंद ने आचार्य जी को बीएसयू का कुलपति बना दिया। इसक एलान होते ही बीएचयू के छात्रों मंे खुशी की लहर दौड़ गयी और लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्रों में मायूसी। लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र मुख्य मंत्री से मिले और आचार्य जी को लखनऊ विश्वविद्यालय का कुलपति बने रहने देने का अनुरोध किया। मुख्यमंत्री द्वारा नकारात्मक उत्तर पाने पर छात्रों ने हड़ताल कर दी। सड़क पर उतर आये छात्रों ने नारा दिया कि हमारा आचार्य हमें चाहिए। छात्र आन्दोलन बढ़ता देख शासन ने फैसला बदला और आचार्य जी को लखनऊ विश्वविद्यालय का कुलपति बनाये जाने का आश्वासन दिया। 

इस आश्वासन की खबर वाराणसी पहुंचते ही बीएचयू के छात्रों ने हड़ताल कर दी। वहां भी नारा लगने लगा कि हमारा आचार्य हमे चाहिए। वहां के छात्र आन्दोलन के बाद आखिरकार मुख्यमंत्री को एलान करना पड़ा कि आचार्य जी ने बीएचयू के कुलपति का भी कार्यभार सम्हालेगे। 

छात्रों का यह रुख ऐसे कुलपति के लिए था जिनकी अनुशासनिक कठोरता की चर्चा शैक्षिक जगत में आम थी। लेकिन इसी के साथ आचार्य जी उदारता, शैक्षिक विकास के प्रति समपर्ण का निर्वहन जैसे गुणों की नहीं व्यवहारिक रुख भी सभी देखते थे।