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Photo Caption: Clipart :: Photo Grapher : Ayodhya Samachar


शिक्षा दिवस मनाने की औपचारिकता तक सिमट गया कर्तव्य


साभार - रमेश शर्मा , स्वतंत्र पत्रकार व लोकतंत्र सेनानी


शिक्षक दिवस व शिक्षा दिवस मनाने की औपचाकिता शिक्षण संस्थाओं शिक्षकों शिक्षा जगत से जुडे़ कुछ लोगों ने पूरी की। संयोग से साल यानी 2015 का शिक्षक दिवस और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी एक ही दिन सितम्बर को मनाया गया।एक बार शिक्षक दिवस व शिक्षा दिवस मनाने की औपचाकिता शिक्षण संस्थाओं , शिक्षकों शिक्षा जगत से जुडे़ कुछ लोगों ने पूरी की। संयोग से इस यानी 2015 का शिक्षक दिवस और श्रीकृष्ण जन्माष्टमी एक ही दिन 5 सितम्बर को मनाया गया। कुछ विद्यालयों के बच्चों की निकली औपचारिकता पूरी करने वाली रैली और रैली में चल रहे बच्चों के हाथों में विभिन्न नारे लिखे ताख्तियां , बच्चांे के कंठ से तेज स्वरों में फूटते व फजाओं में गूंजते रटाए गए नारे एक बार फिर औपचारिकता पूरी करते तथा व्यवस्था के जिम्मेदारों की ओर अंगुली उठाने वाले साबित हुए। जैसे तैसे दायित्व निर्वहन पूरा करने में उलझी सामाजिक व्यवस्था में कर्तव्य निर्वहन ओझल है। हालत यह है कि पढे लिखे लोगों को अतीत का ज्ञान नही है। बहुतायत युवा अपने बाबा के पिता का नाम नही जानते। यह कैसी पढ़ाई, कैसा ज्ञान है नई पीढ़ी देश व समाज के गौरवशाली अतीत से अनजान है, सामाजिक पुरखों से अनजान है, पारिवारिक पुरखों से अनजान है इसके लिए कौन जिम्मेदार है।

यूज एण्ड थ्रो के मौजूदा सामाजिक रिवाज ने ज्ञान और कर्तव्रू की दिशा ही बदल दी है। दायित्व निर्वहन को ही कर्तव्य माना जा रहा और किताबी शिक्षा को ही बहुतायत नई पीढ़ी ज्ञान बता रही। यदा-कदा शिक्षणगण भी किताबी पढ़ाई या उससे जुड़ी प्रयोगात्मक क्रियाओं को ही ज्ञान बताया करते मिले। यह हाल है अवध और अयोध्या क्षेत्र की उन भौगोलिक सीमाओं में बसे लोगों का जहां के महापुरूषों के ज्ञान का डंका देश में ही नही विदेश में भी बजा। इन्हीं भौगोलिक सीमाओं से बिखरे संदेशों  ने पूरे विश्व में इस क्षेत्र को खास पहचान दिलाई।

मर्यादा पुरूषोत्तम राम के जीवन का हर क्षण मानवता और जीवन शैली की मर्यादा का संदेश बिखेरता रहा। इसी माटी में जन्में डा राम मनोहर लोहिया अपने ज्ञान के बूते लोक सभा में सरकारी आंकड़ों की चुनौती देते थे, सरकार जांच काने के बाद डा. लोहिया से क्षमा भी मांगा करती थी। इसी माटी को कर्मभूमि बनाने वाले प्रख्यात शिक्षाविद् व समाजवादी पुरोधा आचार्य नरेन्द्र देव शायद देश के एक मात्र ऐसे कुलपति रहे जिनके लिए छात्रों ने नारा लगाया था ‘‘ हमारा आचार्य हमें चाहिए ’’ इसी माटी में जन्में मौलवी अहमद उल्ला शाह ने 1857 में जंगे आजादी का बिगुल फूंका और अवध क्षेत्र को दो बार अंग्रेजों से मुक्त कराया। 

पूरे देश में शायद यही ऐसा क्षेत्र है जहां से सर्वधर्म समभाव का संदेश दुनिया में गुंजायमान हुआ। राजसी सुख छोड़ आध्यात्म की डगर पर चले कई महामानवों ने इनसानी खिद्मत और खुदाई राह में कदम-कदम पर हालात के थवेडे़ खाकर जीवन होम कर दिया। हिन्दू मुस्लिम यकजयती की बेमिसाल नजीरें इसी भौगोलिक सीमाओं में है त्याग बलिदान और संघर्ष की गौरवशाली गाथा इसी क्षेत्र ने लिखी। पर नई पीढी अतीत की गौरवशाली धरोहरों, महामानवों और उनकी सेवाओं से अनजान है। कारण यह कि स्कूल किताबों में बहुतायत चीजों का जिक्र ही नही है। 

साधारण आदमी नही जानता है कि दायित्व निर्वहन क्या हे और कर्तव्य निर्वहन क्या है प्रदत्त दायित्व निर्वहन और स्वस्फुटित कर्तव्य बाोध का फर्क स्नातक व परास्नातक उत्तीर्ण छात्र नही जानते। बहुतायत शिक्षक भी यह फर्क नही बता पाते। ओझल होते जा रहे कर्तव्य बोध वाली सूरते हाल में दायित्व निर्वहन के प्रति भी सजगता के बजाय काम चलाऊ रवैय्या ही दिखता है। ज्ञान, संस्कार व सरोकार पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तानान्तरित होती आयी स्वाभाविक प्रक्रिया रही है। इस प्रक्रिया को घरों के व समाज के बुर्जुग अपने कर्तव्यबोध से पूरा करते रहे। लेकिन मौजूदा दौर में सिखाने के जिम्मेदार या तो खुद अनजान है या आधुनिकता की मार से इतना बोझिल है कि उन्हें वर्तमान छोड़ न तो अतीत की सुधि है और न भविष्य की परवाह। आने वाली पीढ़ी के प्रति कर्तव्य व्यबोध से ऐसे लोग कंगाल है और दायित्व बोध के मामले में घृतराष्ट्र की भूमिका में दिखते है।

आठ सितम्बंर को शिक्षा दिवस मनाने कि औपरिकता शिक्षण संस्थाओं से लेकर शिक्षा विभाग के कई जिम्मेदारों ने पूरी की। शासन प्रशासन व शिक्षा विभाग के अधिकारी इस सच्चाई से भी भली भातिं वाकिफ है कि लगभग 40 प्रतिशत बच्चे विभिन्न कारणों से शिक्षा से मौजूदगी व्यवस्था के जिम्मेदारों और श्रम विभाग के अधिकारियों पर अंगुली उठा रही है। अनेक प्रतिष्ठानों में काम करने वाले बड़े बच्चे, किशोर व युवतियां शिक्षा से महरूम होने और हालात से मजबूर होने का दर्द बयां कर रही है पर हालात की अनदेखी बरकरार है।

“ ऐसी भी नही कि गली कूचे में हो मुख्य बाजार, बाजार की मुख्य सड़के हाकिमों की बस्ती वाले मोहल्लों में चल रही विभिन्न दुकानों पर काम करने वाले छोटू मिल जायेंगे। सुबह-शाम प्लास्टिक के बड़े-बड़े थैले लिए जगह-जगह कूड़े के ढेर को खंगालते, कुछ निकालते और थैले में रखते बच्चे सभी को दिखते है पर कर्तव्य बोध की कंगाली ने इंसानियत के जज्बा से लबरेज देश की माटी को मानवता के मामले में असर बना दिया है। यह हाल तब है जब सरकार से लेकर जिम्मेदार हाकिम तक शिक्षा का उजियारा फैलाने का दंभ भर रहे हैं।