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Photo Caption: Clipart :: Photo Grapher : Ayodhya Samachar

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साभार - रमेश शर्मा, वरिष्‍ठ पत्रकार


“ घोटी तख्ती सत्तर पार, छूटी कलम की थी दरकार


“ मौजूदा समय में बच्चों को पता नही पढ़ाई का पहले का तरीका


फैजाबाद ।  कम्प्यूटर, टैबलेट, लैपटॉप, कैल्कुलेटर वाला दौर देख रहे बच्चों को पता नही पहले लिखते और पढ़ने की क्या पद्धति थी और कौन- कौन से साधन थे छोटी सी उम्र में ही खुद के वजन से ज्यादा बोझ वाला बस्ता लेकर स्कूल जाने वाले बच्चों को क्या पता कि तख्ती से शुरू हुई लेखन प्रक्रिया धीरे-धीरे तमाम उतार-चढ़ाव देखते हुए यहां तक पहुंची है। ज्ञान-विज्ञान की प्रगति के साथ ही आधुनिकता की भोंदी होड़ ने अनेक मायनों में बचपन को सामाजिकता की ऊसर होती जा ही धरती पर अच्छी फसल का सब्जबाग दिखाया जो शैनः शैनः छात्रों को उद्दंडता, निरंकुशता व संस्कार हीनता की ओर अग्रसर किया।

ऐसा नही कि तख्ती और  धूटी वाले दौर के छात्र-छात्राओं ने कामयाबी का परचम न लहराया हो। मौजूदा समय सेवानिवृत्ति की सीमा पर पहुंचे या सेवानिवृत्त हो चुके विभिन्न क्षेत्र के अग्रणी लोग उसी युग के रहे। उस जमाने के छात्र भी आई.ए.एस., आई.पी.एस., पी.सी.एस. होते थे आचार्य होते थे वैज्ञानिक होते थे।  कई क्षेत्र में उसी दौर के पढ़े लोगों ने विश्व स्तर पर अपनी कीर्ति पताका फहरायी। अंग्रेजी, ऊर्दू, संस्कृत, हिन्दी में विद्वता के साथ ही दक्षता तो प्रायः स्नातक तथा स्नातकोत्तर कक्षा तक हो जाया करती थी। लेकिन मौजूदा समय बहुतायत स्नातक और स्नातकोत्तर छात्र अपनी बात को क्रमवार लिपिबद्ध नही कर पाते। 

मौजूदा समय ऊर्दू के जानकारों का अकाल हो गया है। कचहरी व अन्य जगह की पुरानी पत्रावलियों व अभिलेखों को पढ़ने वाले ढूठे नही मिलते है। संस्कृत के जानकारों का भी यही हाल है। अंग्रेजी के मर्मज्ञ लोगों की कमी होती जा रही है। यही हाल रहा तो आने वाले एक दशक बाद अंग्रेजी की पत्रावलीयों व अभिलेखों को पढ़कर समझने वालों का टोटा हो जायेगा।  ऐसा केवल इसलिए होरहा है क्यो कि हम अतीत की ओर झंकना नही चाहते। अतीत की कड़ियों से वास्ता नही रखना चाहते।  बच्चों में जिज्ञासा उपजने के विषय बदल गये है।  जिस चीज के बार में जिज्ञासा नही उपजेगी उसे कोई जानेगा कैस। 

आधुनिकता की होड़ मे दिनों दिन बदलते गए पढ़ाई के तरीके और कान्वेण्ट स्कूलों में कॉपी किताब के बढ़ते बोझ ने बचपन को संकीर्ण दायरे में समेट दिया है। कापी किताब के भारी भरकम बोझ वाला बैग लिए स्कूल जाने वाले बच्चों की इस पौध में अधिकांश उम्र बढ़ने के साथ ही बीमारी के शिकार हो जाते है या मानसिक विकृतियों के जाल में उलझ जाते है। दूसरी ओर सरकारी निर्धारण वाले पाठ्यक्रम के अनुसार पढ़ाई करने वाले बच्चे तुलनात्मक रूप से सर्वांगीण विकास की दृष्टि से बेहतर निकलते है।


“ आजादी के बाद भी 80 के दशक तक घूटी (खड़िया) और तख्ती का चलन ग्रामीण अंचल के विद्यालयों में रहा। लकड़ी की तख्ती को दवात के पेदें से बच्चे इतना घिसते थे कि तख्ती चमकने लगती थी।  फिर दवाम में मोटे तागे वाली डोरी से तख्ती पर आवश्यकतानुसार खड़ी या बेड़ी लाइन बनाते थे इसे सत्तर पारना कहा जाता था। उसके बाद नरकुल (सेंठा) की कलम से भीगी खडिया वाली दवात में डुबोकर तख्ती पर लिखा जाता था।


कालांतर में तख्ती की जगह स्लेट का चलन बढ़ा उस पर चाक से लिखा जाता था। जूनियर स्तर पार करने के बाद काॅपी पर लिखा जाता था।  हिन्दी , अंग्रेजी और गणित के लिए क्रमशः रूलदार, चार लाइनों और चार खानों वाली कापियां होती थी। लिखने के लिए होल्डर और निब होती थी निब भी दो तरह की होती थी। हिन्दी के लिए अलग निब तथा अंग्रेजी के लिए अलग निब होती थी। शीर्षक के लिए क्लिक कलम आती थी। बडी़ कक्षाओं में पहुंचने पर फाउन्टेन पेन से लिखा जाता था। पेन में स्याही भरी जाती थी। 

अस्सी के दशक तक पढ़ाई के तरीकों में याद करने तथा लिखने पर अधिक जोर दिया जाता था। कक्षा के अलावा इतना होमवर्क मिलता था कि चार- छः पन्ने लिखने ही पड़े। इससे दिमागी ग्राह्य शक्ति के साथ ही लिखावट में क्रमशः सुंदरता भी आती थी। विषय वस्तु को कंठस्थ करने वाले तथा सुलेखीय छात्र-छात्राओं को कक्षा में ही अध्यापक तारीफ कर उसका मनोबल बढाते थे और दूसरों का प्रेरित करते थे।


“ इन बातों का यह मतलब नही की पुराने ढर्रे पर चला जाय बल्कि अतीत का ज्ञानार्जन कर मौजूदा संसाधनों के अनुरूप उस दिशा में बढ़े जो व्यक्तिके सम्पूर्ण व्यक्तित्व में निखार लाने का माध्यम बनें।