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निवियहवा पोखरा पर चल रही श्रीराम कथा


(Ambedkar Nagar, 21 Mar),  जिस ब्रहम को वेदों ने बताया है, उसका वर्णन किया है यदि वही ब्रहम साक्षात किसी के सामने खड़ा हो तो उसकी क्या स्थिति होगी, इसे आसानी से समझा जा सकता है। कमोवेश यही हाल उस समय राजा जनक का हुआ जब राम व लक्ष्मण जनकपुर में उनके सामने खड़े थे। राजा जनक किस प्रकार के ज्ञानी थे इसका अंदाजा इसी से हो सकता है कि सनकादिक जैसे महात्मा राजा जनक से सत्संग करने आते थे। सीता स्वंयवर व राम के जनकपुर पंहुचने के इस रोचक प्रसंग का वर्णन करते हुए मानस मंजरी नारायणी ने कहा कि जब से राम व लक्ष्मण अपने गुरू विश्वामित्र के साथ जनकपुर पंहुचे थे तब से वहां का माहौल पूरी तरह से राममय हो गया था। जनक जी ने राम को ब्रहम तो मान लिया था लेकिन उसके बावजूद उन्होने सामान्य शिष्टाचार में कोई कमी नही की। जिस परमात्मा का दर्शन लोग मन के अन्दर करते रहे उसी परमात्मा का दर्शन उन्हें बाहर होने लगा। निवियहवा पोखरा पर चल रही श्री राम कथा के चौथे दिन नारायणी जी ने धनुष यज्ञ प्रसंग का जीवन्त वर्णन किया।